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“असली पत्रकार खबर खोज रहा है, नकली पत्रकार खबर बनकर घूम रहा है”
आजकल पत्रकारिता का स्तर इतना ऊँचा हो गया है कि जिसे “खबर और खबरी” में फर्क नहीं पता, वह भी खुद को “वरिष्ठ पत्रकार” लिखवा रहा है। पहले पत्रकार बनने के लिए वर्षों की मेहनत, अध्ययन और समाज की समझ चाहिए होती थी, अब सिर्फ एक स्मार्टफोन, एक माइक कवर और प्रेस लिखी बाइक ही काफी है।
शहर और गाँव में सुबह-सुबह कुछ स्वघोषित पत्रकार ऐसे निकलते हैं जैसे मोहल्ले का खुला सांड खेतों का निरीक्षण करने निकला हो। चाय की दुकान पर चाय पीना, पान की दुकान पर पान खाना, दो-चार लोगों को हड़काना और फिर “प्रेस” लिखी बाइक पर सवार होकर लोकतंत्र बचाने निकल पड़ना—यही इनकी दैनिक दिनचर्या है।
किसी ने नया व्यवसाय शुरू किया? ब्रेकिंग न्यूज़।
किसी ने नई कार खरीदी? ग्राउंड रिपोर्ट।
किसी के घर गृह प्रवेश हुआ या मंदिर में दर्शन किए? लाइव कवरेज।
और अगर कहीं दो कुत्ते लड़ जाएँ तो “शहर में दहशत का माहौल” शीर्षक से वीडियो तैयार।
सबसे अद्भुत प्रजाति तो वह है जो सुबह पत्रकार, दोपहर में किसी पार्टी का मीडिया प्रभारी और शाम को किसी संगठन का प्रदेश अध्यक्ष बन जाती है। निष्पक्षता इनसे उतनी ही दूर है जितना चुनाव के समय नेताओं से सच।
कुछ स्वयंभू संगठन प्रमुख भी हैं, जिनका पत्रकारिता से उतना ही संबंध है जितना ऊँट का हवाई जहाज से। उनका मुख्य कार्य है—फोन लगाओ, आयोजन करवाओ, सम्मान करवाओ, फोटो खिंचवाओ और सहयोग राशि के नाम पर चंदा जुटाओ। समाज सेवा कम, जेब सेवा ज्यादा।
आजकल वकालत के पेशे में भी पत्रकारिता का ऐसा नशा चढ़ रहा है कि कुछ लोग मुकदमे कम लड़ते हैं और कवरेज ज्यादा करते दिखाई देते हैं। अदालत की बहस से ज्यादा चिंता उन्हें खबर कवरेज की रहती है। मानो न्यायालय से सीधे न्यूज़रूम में नियुक्ति मिल गई हो।
एनजीओ संचालक भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। उन्हें देखकर लगता है मानो एनजीओ का पंजीकरण करवाते समय पत्रकारिता की डिग्री भी मुफ्त में मिल गई हो। कल तक जो केवल जनता की आवाज उठाने का दावा कर रहे थे, आज वे खबरों का गैराज खोलकर बैठे हैं। पत्रकारिता की एबीसीडी भले न आती हो, लेकिन माइक पर नाम लिखवाने और खुद को संपादक घोषित करने में कोई कमी नहीं छोड़ते। अब तो “तीसरी पास” भी लोकतंत्र का “चौथा स्तंभ” बनने का दावा कर रहा है।
डिजिटल युग ने पत्रकारिता को जितनी ताकत दी है, उतनी ही तेजी से स्वघोषित पत्रकारों की फसल भी उगाई है। अब न संपादक की जरूरत है, न समाचार कक्ष की, न भाषा ज्ञान की और न पत्रकारिता के सिद्धांतों की। एक मोबाइल हाथ में, फेसबुक लाइव चालू और व्यक्ति सीधे ‘चीफ एडिटर’ बन जाता है। हालत यह है कि कई लोग खबर लिखने से पहले उसका मतलब नहीं समझते, लेकिन लाइव जरूर कर देते हैं।
इन स्वघोषित पत्रकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पत्रकारिता का ज्ञान हो या न हो, लेकिन आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा होता है। शब्दों की हत्या करने में तो कई महारथी हैं। ‘श्रद्धांजलि’ लिखनी हो तो पांच तरीके से गलत लिख देंगे, ‘उद्घाटन’ का ऐसा पोस्टमार्टम करेंगे कि हिंदी व्याकरण भी शर्म से सिर पकड़ ले। खबर पढ़ते समय पाठक को समझ नहीं आता कि वह समाचार पढ़ रहा है, पहेली बुझा रहा है या किसी तीसरी कक्षा के छात्र की उत्तर-पुस्तिका जांच रहा है।
व्याकरण इनके लिए वैसी ही अनावश्यक चीज है जैसे चुनाव जीतने के बाद नेता के लिए जनता। वर्तनी की गलतियाँ इतनी होती हैं कि एक खबर में जितनी गलतियाँ नहीं होनी चाहिए, उससे ज्यादा तो इनके पदनाम में होती हैं। लेकिन मजाल है कि आत्मविश्वास में कोई कमी आ जाए! नाम के आगे ‘प्रधान’, ‘मुख्य’, ‘वरिष्ठ’, ‘चीफ एडिटर’ और ‘संस्थापक संपादक’ लिखवाने में ये पीएचडी किए बैठे हैं, भले ही पत्रकारिता की एबीसीडी आज तक न आई हो।
गांव-गांव में भी अजब नज़ारे हैं। कोई “लाइव दर्पण” दिखाने में व्यस्त है तो कोई “सच दिखाने” की आड़ में अपना अलग ही कारोबार चला रहा है। खबर कम, प्रचार ज्यादा और जनहित से ज्यादा स्वयंहित की चिंता दिखाई देती है।
गाँव-गाँव, ढाणी-ढाणी में अब ऐसे पत्रकार मिल जाएँगे जो कैमरे से ज्यादा अपनी जेब का फोकस ठीक रखते हैं। हालात ऐसे हैं कि असली पत्रकार खबर खोज रहा है और नकली पत्रकार खबर बनकर घूम रहा है।
कभी पत्रकार सत्ता से सवाल पूछता था, आज कई लोग सिर्फ इतना पूछते हैं—”भाई साहब, कवरेज का क्या रहेगा?”
हालांकि आज भी कई सच्चे पत्रकार ऐसे हैं जो सुविधाओं के अभाव में भी सच की मशाल जलाए हुए हैं। वे सत्ता, संगठन और स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज की आवाज़ बनते हैं। ऐसे पत्रकारों की वजह से ही पत्रकारिता पर जनता का भरोसा आज भी कायम है।
पत्रकारिता के इस स्वर्णिम काल में एक ही सलाह है—अगर आप भी पत्रकार बनना चाहते हैं तो पढ़ाई-लिखाई छोड़िए, पहले माइक खरीदिए। बाकी ज्ञान तो फेसबुक लाइव करते-करते अपने आप आ जाएगा!
अंत में सबसे बड़ा चिंतनीय विषय यह है कि इन स्वघोषित पत्रकारों की वजह से आज सच्ची पत्रकारिता भी सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है। पत्रकारिता का मतलब हाथ में माइक और मोबाइल होना नहीं, बल्कि समाज के प्रति जवाबदेही, सच के प्रति प्रतिबद्धता और सत्ता से सवाल पूछने का साहस होना है।
दुर्भाग्य यह है कि आज कई लोग पत्रकारिता को सेवा नहीं, सुविधा समझ बैठे हैं। ऐसे में असली पत्रकार की पहचान भीड़ में खोती जा रही है और नकली पत्रकारों की भीड़ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा खतरा शायद और कोई नहीं कि खबर बेचने वाले बढ़ जाएँ और सच खोजने वाले कम पड़ जाएँ।
– व्यंग्य लेख – व्यंग्यकार की कलम से ✍️
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