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सड़कों पर दौड़ रहे दूध के ड्रम, लेकिन शुद्धता की गारंटी किसके पास ?
सुबह से देर रात तक शहर की गली-मोहल्लों में हो रही हजारों लीटर दूध की सप्लाई
मालपुरा (टोंक)। सुबह के सूरज के साथ ही उपखंड क्षेत्र की सड़कों पर दूध के ड्रमों से लदी मोटरसाइकिलें दौड़ने लगती हैं। शहर की गलियों में हर दिन हजारों लीटर दूध पहुंचाया जा रहा है। यही नहीं, यह कारोबार केवल सुबह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देर रात तक गली-मोहल्लों में दूध विक्रेता मोटरसाइकिलों पर ड्रम भर-भरकर दूध बेचते और सप्लाई करते नजर आते हैं। दिन हो या रात, घर-घर दूध पहुंच रहा है, लेकिन इसके साथ एक सवाल भी लोगों के मन में लगातार उठ रहा है—क्या ड्रमों में भरकर बेचा जा रहा यह दूध वास्तव में शुद्ध है?
मालपुरा शहर सहित पूरे उपखंड क्षेत्र में दूध की खपत लगातार बढ़ रही है। हजारों परिवार प्रतिदिन दूध खरीदकर अपने घरों में उपयोग कर रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक हर आयु वर्ग के लिए दूध आवश्यक खाद्य पदार्थ माना जाता है। लेकिन जिस तेजी से दूध का कारोबार बढ़ रहा है, उसी तेजी से इसकी गुणवत्ता और शुद्धता को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि दूध खरीदते समय उन्हें केवल विक्रेता के भरोसे पर निर्भर रहना पड़ता है। अधिकांश उपभोक्ताओं को यह जानकारी नहीं होती कि जो दूध उनके घर तक पहुंच रहा है, वह कहां से आया है, उसकी गुणवत्ता क्या है और उसकी आखिरी जांच कब हुई थी। ऐसे में उपभोक्ता केवल विश्वास के आधार पर दूध खरीदने को मजबूर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या मालपुरा उपखंड क्षेत्र में वास्तव में इतना दूध उत्पादन होता है कि हर घर तक पर्याप्त मात्रा में ताजा दूध पहुंच सके? यदि स्थानीय उत्पादन सीमित है तो बाजार में प्रतिदिन बिक रहे हजारों लीटर दूध की पूर्ति कहां से हो रही है? क्या ग्रामीण क्षेत्रों से लाया जा रहा यह दूध सुरक्षित और मानकों के अनुरूप है? क्या संबंधित विभागों के पास इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड और निगरानी तंत्र मौजूद है?
कुछ समय पहले डिग्गी क्षेत्र में पुलिस की डिस्ट्रिक्ट स्पेशल टीम (DST) ने नकली और मिलावटी दूध बनाने वाली फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया था। इस कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र में सनसनी फैला दी थी। मामले ने यह भी साबित कर दिया था कि दूध जैसे आवश्यक खाद्य पदार्थ में मिलावट की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि उस कार्रवाई के बाद दूध की गुणवत्ता को लेकर कितनी सख्ती बरती गई? क्या नियमित जांच अभियान चलाए गए? क्या दूध विक्रेताओं और डेयरियों के नमूने लगातार लिए गए?
शहर में प्रतिदिन ड्रमों में भरकर दूध बेचा जा रहा है, लेकिन क्या उसकी नियमित सैंपलिंग हो रही है? खाद्य सुरक्षा विभाग ने पिछले एक वर्ष में कितने नमूने लिए, कितने नमूने मानकों पर खरे उतरे और कितनों पर कार्रवाई हुई? यह जानकारी सार्वजनिक रूप से सामने क्यों नहीं आती? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, तब तक लोगों के मन में संदेह बना रहना स्वाभाविक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दूध में पानी, सिंथेटिक पदार्थ, डिटर्जेंट, यूरिया अथवा अन्य अवांछित तत्वों की मिलावट स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों पर पड़ सकता है। यही कारण है कि दूध की शुद्धता केवल व्यापारिक विषय नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा विभाग को नियमित और व्यापक स्तर पर जांच अभियान चलाना चाहिए। डेयरियों, दूध संग्रह केंद्रों और सप्लाई नेटवर्क से जुड़े लोगों के नमूने लेकर प्रयोगशाला जांच कराई जानी चाहिए तथा जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी चाहिए। यदि कहीं मिलावट पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि आमजन का भरोसा कायम रह सके।
जनता का सवाल बिल्कुल साफ है—जब हजारों लीटर दूध रोजाना ड्रमों में भरकर घर-घर पहुंच रहा है, तो उसकी शुद्धता की गारंटी कौन देगा? सड़कों पर दौड़ते दूध के ड्रम तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनकी निगरानी और जांच आखिर कहां दिखाई दे रही है?
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