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“हमारी नगरी में भक्ति का बजट और भावनाओं का टेंडर”

“हमारी नगरी में भक्ति का बजट और भावनाओं का टेंडर”

हमारी नगरी में इस बार चैत्र प्रतिपदा पर ऐसा भव्य आयोजन हुआ कि भक्ति भी सोच में पड़ गई- “मैं यहां हूँ या किसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के शो में?”

नगर पालिका ने पूरे जोश-खरोश के साथ “श्याम भजनो की अमृत गंगा बहा दी। लाखों रुपये का बजट, बाहर से आए सुप्रसिद्ध कलाकार, चमचमाती सजावट… सब कुछ ऐसा कि मानो भक्ति नहीं, ब्रांडिंग हो रही हो।

और हाँ, ब्रांडिंग भी खूब हुई-पैसा नगर पालिका का, लेकिन पोस्टर पर मुस्कान किसी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष साहब की। पालिका का नाम भी था… मगर “निवेदक” में, जैसे किसी शादी में दूर के रिश्तेदार का नाम कार्ड के कोने में छप जाता है।

अब बाबा श्याम के भजनों में कोई कमी नहीं थी-आवाज़ भी सुरीली, मंच भी जगमगाता, और व्यवस्था भी शानदार। लेकिन शहर के लोगों के मन में एक छोटा सा सवाल बड़े आराम से बैठ गया- “भाई, नववर्ष के साथ नवरात्र भी शुरू हुए हैं… माता रानी का जगराता भी हो सकता था ना?”

फिर किसी ने धीरे से याद दिलाया “रामनवमी भी इसी महीने है… श्रीराम जी की भजन संध्या भी बनती थी…”

पर लगता है पालिका ने सोचा होगा- इतनी सारी भक्ति एक साथ कर दी तो जनता कहीं ओवरडोज़ में न चली जाए!

वैसे “हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा” का नारा तो पूरे कार्यक्रम में गूंजा, लेकिन लगता है शहर के स्थानीय कलाकारों ने भी मन ही मन यही कहा होगा- “हारे का सहारा… हमारे लिए भी कोई सहारा?”

क्योंकि बाहर से कलाकार बुलाने के लिए लाखों के टेंडर जारी हुए, पर अपने शहर के हुनरमंदों को देखकर शायद फाइल ही नहीं खुली। ऐसा लगा जैसे हमारी नगरी में प्रतिभा नहीं, “टेंडर योग्यता” ही असली योग्यता बन गई हो।

और कार्यक्रम का दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था-

आधे लोग भक्ति में नहीं, चाय में डूबे थे…

कुछ लोग भजन से ज्यादा गपशप में तल्लीन थे…

और जो सच्चे भक्त थे, वे फिल्मी तर्ज पर ढले भजनों में भगवान को ढूंढने की कोशिश कर रहे थे।

सजावट भी ऐसी कि लगता था जैसे शहर नहीं, शादी का पंडाल हो-बस फर्क इतना कि यहां बारात की जगह “बजट” नाच रहा था।

विशेष आकर्षण भी कम नहीं था-

भजनों का अमृत पान करने आई नारी शक्ति को खाली हाथ नहीं लौटना पड़ा। पालिका प्रशासन ने “उपहार” की भी व्यवस्था कर रखी थी महिलाओं के हाथों में थमाई गई प्लास्टिक बाल्टी, यानी डस्टबिन ।

डस्टबिन ऐसा कि एक बार का कचरा भी शायद सोच में पड़ जाए- “मैं इसमें समाऊँ या नहीं?” पर हाँ, डस्टबिन का बजट जरूर बड़ा रहा होगा… यह बात सिर्फ पालिका ही बेहतर जानती है।

अंत में, हमारे नगरी की बात ही निराली है-

यहां भक्ति भी होती है, राजनीति भी…

यहां श्रद्धा भी है, और सवाल भी… और सबसे खास बात यहां हर आयोजन के बाद एक

नई चर्चा जरूर जन्म लेती है।

खैर, कार्यक्रम तो हो गया… फोटो भी आ गए, खबर भी छप गई…

अब अगली बार देखना ये है कि भक्ति का मंच सजता है, या फिर “टेंडर की महाभारत” फिर से खेली जाती है।

यह तो पालिका के धणी रामजी ही जाने…! (व्यंग्य लेख लेखक की कलम से)

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