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“धर्मनगरी में 10 लाख का टीवीः भगवान स्क्रीन पर, सवाल जमीन पर!”

“धर्मनगरी में 10 लाख का टीवीः भगवान स्क्रीन पर, सवाल जमीन पर!”

नवाबी जिले की धर्मनगरी की पावन धरती पर अब विकास भी “लाइव टेलीकास्ट” होने लगा है। फर्क बस इतना है कि पहले भगवान के दर्शन करने लोग मंदिर जाते थे, अब बस स्टैंड पर खड़े-खड़े HD क्वालिटी में दर्शन होंगे वो भी पूरे 10 लाख रुपये की आस्था के साथ !

जी हां, पंच गौरव योजना के तहत करोड़ों का बजट आया था, ताकि जिले की पहचान को नई ऊंचाई मिले। हमारे जिले ने भी विकास में पीछे नहीं रहने का फैसला किया… योजना में त्रिलोकीनाथ मंदिर को चुना गया।

लेकिन असली “विकास” तो बस स्टैंड पर चमक गया-10 लाख का एलईडी टीवी !

अब आम आदमी सोच में पड़ गया है- “भाई, ये टीवी है या छोटा-मोटा सिनेमा

हॉल… या फिर सोने का बना है?”

गांव के एक बुजुर्ग बोले- “इतने में तो हमारे पूरे मोहल्ले में हर घर में टीवी लग जाता…

और ऊपर से एक-एक डिश भी!”

दूसरे सज्जन ने तंज कसा-

“लगता है ये टीवी नहीं, ‘भक्ति का 5G टावर’ है… सीधा स्वर्ग से कनेक्शन देता होगा!” लेकिन अब असली सवाल यहीं से शुरू होता है- बाजार में अगर एक बेहतरीन क्वालिटी का बड़ा एलईडी टीवी 4 से 5 लाख रुपये में आराम से मिल जाता है, तो फिर ये 10 लाख का आंकड़ा कैसे पार कर गया?

क्या इसमें स्क्रीन के साथ “चमत्कार” भी फ्री आया है?

या फिर ये कीमत सिर्फ टीवी की नहीं, बल्कि “व्यवस्था” की भी है?

अब जरा नगर पालिका प्रशासन की दूरदर्शिता भी देख लीजिए-

जहां आम जनता सड़क के गड्डों में झूल रही है, पानी के लिए लाइन में खड़ी है, और सफाई के नाम पर धूल उड़ रही है…

वहीं पालिका ने सोचा- “पहले दर्शन हाई क्वालिटी में होने चाहिए, बाकी समस्याएं तो

भगवान भरोसे !”

पालिका शायद ये मानकर चल रही है कि-

अगर स्क्रीन चमकती रहेगी, तो जनता की नजर गड्ढों पर नहीं जाएगी!

कहा जा रहा है कि इस टीवी पर लाइव दर्शन होंगे। मतलब अब लाइन में लगने की जरूरत नहीं- बस स्टैंड पर खड़े रहो, बस लेट हो जाए तो कोई चिंता नहीं… 10 लाख की स्क्रीन पर टाइमपास भी, दर्शन भी!

अब जनता के मन में सवालों की पूरी “HD सीरीज” चल रही है-

क्या इस खरीद में पूरी पारदर्शिता बरती गई?

क्या टेंडर प्रक्रिया सही तरीके से हुई? और सबसे बड़ा सवाल- क्या ये खर्च वाकई जरूरी था?

पंच गौरव योजना का मकसद था जिले को पहचान दिलाना… और धर्मनगरी ने सच में पहचान बना ली-

अब लोग कह रहे हैं, “वो मंदिर वाला बस स्टैंड नहीं… 10 लाख वाले टीवी वाला बस स्टैंड है!”

हंसी अपनी जगह है, लेकिन बात गंभीर है- अगर विकास सिर्फ स्क्रीन पर ही दिखे और जमीन पर न दिखे, तो फिर ये “HD विकास” आखिर किसके काम का?

अंत में जनता का सीधा संदेश (पालिका प्रशासन के नाम):

“भगवान के दर्शन तो मन से भी हो जाते हैं… लेकिन साहब, 4-5 लाख वाले काम को 10 लाख में दिखाना बंद कीजिए… और अगर विकास दिखाना ही है, तो जरा उसे जमीन पर भी ‘लाइव’ कर दीजिए!”

(व्यंग्य लेख : लेखक की कलम से…)

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