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सवालों से प्रचार तकः बदलती कलम पर बड़ा सवाल
कभी कलमकार की कलम सच लिखती थी-सीधी, सटीक और सत्ता से सवाल पूछती हुई। आज वही कलम कुछ जगहों पर “सवाल” कम और “प्लॉट सेल” ज्यादा करती नजर आ रही है। खबर और इश्तिहार के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि आमजन समझ ही नहीं पा रहा- यह खबर है या प्रचार ?
कॉलोनियों का नया दौर है। नक्शे बाद में बनते हैं, पोस्टर पहले छपते हैं। सुविधाएं बाद में आती हैं, ऑफर पहले घोषित हो जाते हैं। और सच्चाई? वह तो चमकदार शब्दों के नीचे कहीं दब सी जाती है। ऐसे में कलमकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है- लेकिन अगर वही कलम कॉलोनाइजर के साथ कदमताल करने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है।
कभी कलमकार पूछता था-रेरा पंजीकरण है या नहीं? जमीन का रूपांतरण हुआ या नहीं? सड़क, पानी, बिजली, नालियां और सीवरेज कब आएंगे?
अब कुछ जगहों पर सवाल बदल गए हैं- “ऑफर कितना दमदार है?” “बुकिंग कितनी तेज चल रही है?” “सपनों का आशियाना – जल्दी आओ, जल्दी पाओ !”
कभी अखबार चेतावनी देता था- “निवेश से पहले पूरी जांच करें।”
अब कहीं-कहीं संदेश बन गया है- “जल्दी करें, मौका हाथ से निकल जाएगा!”
व्यंग्य यही है कि कलम, जो कभी जनता की आवाज थी, अगर वही प्रचार की आवाज बन जाए तो आमजन जाए तो जाए कहां? जब खबर ही सवाल पूछना छोड़ दे, तो जवाब कौन देगा?
हालांकि यह भी सच है कि हर कलमकार ऐसा नहीं है। आज भी कई कलमें हैं जो सच लिख रही हैं, जोखिम उठा रही हैं और जनहित को सर्वोपरि रख रही हैं। लेकिन कुछ अपवाद पूरे पेशे की साख पर सवाल खड़े कर देते हैं।
आखिर में सवाल वही- अगर कलम ही दलाली करने लगे, तो सच की रखवाली कौन करेगा?
शायद इसलिए अब लोग खबर से ज्यादा जागरूकता पर भरोसा करने लगे हैं… क्योंकि अंत में “कल्याण जी महाराज ही मालिक” हैं। (व्यंग्य लेख लेखक की कलम से…)
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