Chief Editor
“कुर्सी की जड़ें गहरी… संगठन की हालत पतली !”
शहर की राजनीति में इन दिनों ऐसा तूफान उठा है कि तिरंगी पार्टी के दफ्तर में अब फुसफुसाहट भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने लगी है। बात धीमी होती है, लेकिन असर ऐसा कि दीवारें भी अब कान नहीं, वाई-फाई लगाकर सुन रही हैं।
शहर अध्यक्ष जी 15 सालों से कुर्सी पर इस मजबूती से जमे हैं कि अब कुर्सी भी रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर “स्थायी रिश्ता” दर्ज कराने की सोच रही है। हालत यह है कि अगर कुर्सी बोले- “थोड़ा आराम चाहिए”, तो अध्यक्ष जी कहें- “पहले मेरा कार्यकाल खत्म होने दो!”
उपलब्धियों की फाइल खोलो तो धूल ऐसे उड़ती है जैसे वह ही असली संस्थापक सदस्य हो-बाकी सब तो बाद में आए मेहमान हैं। फाइल में काम कम, यादें ज्यादा और यादों में भी “कभी करेंगे” वाली योजनाएं ही ज्यादा मिलती हैं।
उधर कार्यकर्ताओं का भी मिजाज बदल चुका है। पहले जो “जय-जय” करते थे, अब “क्यों-भाई?” पूछते हैं। मीटिंग में हाल ऐसा कि जोश बाहर गेट पर ही चप्पल उतारकर बैठ जाता है, अंदर सिर्फ भाषण घुसते हैं वो भी बिना नमक, बिना मसाला !
ब्लॉक अध्यक्ष जी भी मैदान में हैं, लेकिन उनका प्रदर्शन ऐसा है जैसे कोई कप्तान बिना बल्ले के नहीं, बल्कि बिना टीम के ही मैच जीतने निकल पड़ा हो। जोश भरने की कोशिश करते हैं, लेकिन कार्यकर्ता पूछ लेते हैं- “सर, यह जोश पेट से आएगा या पोस्टर से?”
अब कार्यकर्ताओं ने साफ कर दिया है-
नाश्ता मुद्दा नहीं है… लेकिन बिल्कुल न हो तो यह ‘लोकतांत्रिक उपवास’ बन जाता है! चाय-कचोरी अब सिर्फ नाश्ता नहीं, संगठन की “इमरजेंसी एनर्जी सप्लाई” घोषित हो चुकी है।
लेकिन असली विस्फोटक बात यह है- कार्यकर्ताओं को अब नाश्ते से ज्यादा नेतृत्व की भूख लग चुकी है! उन्हें ऐसा शहर अध्यक्ष चाहिए-
जो कुर्सी को “जन्मसिद्ध अधिकार” न समझे, जो संगठन को सिर्फ पोस्टर और फोटो तक सीमित न रखे, जो कार्यकर्ताओं को “अगली मीटिंग में देखेंगे” नहीं, बल्कि “आज काम करते हैं” कहे
15 साल की स्थिरता अब इतनी जम चुकी है कि उसे हटाने के लिए शायद जेसीबी बुलानी पड़े ! कार्यकर्ता कह रहे हैं- “अगर अब भी बदलाव नहीं हुआ, तो पार्टी बैकफुट से सीधे रिटायर्ड हर्ट घोषित हो जाएगी!”
अब असली सवाल यह नहीं है कि “कौन कितनी चाय पिलाएगा”,
बल्कि यह है कि कौन पार्टी में जान डालेगा और कार्यकर्ताओं को फिर से मैदान में उतारेगा।
अंत में एक पुराने कार्यकर्ता ने तगड़ा व्यंग्य छोड़ा- “नेतृत्व ऐसा हो जो कुर्सी संभाले नहीं, संगठन संभाले… और हाँ, कभी-कभार चाय भी दे दे, ताकि कार्यकर्ता भागे नहीं, टिके रहें!”
और सबसे बड़ा द्विस्ट-
कुछ कार्यकर्ता तो इतने ‘प्रेरित’ हो गए कि तिरंगी पार्टी का हाथ छोड़कर दुरंगी पार्टी का दामन थाम लिया।
अब इसे विचारधारा का परिवर्तन कहें या “नाश्ता और नेतृत्व” का कॉम्बो ऑफर – यह समझना भी अपने आप में एक राजनीतिक रिसर्च का विषय बन चुका है ! व्यंग्य लेख : लेखक की कलम से…
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