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“500 रुपये-स्कूल के लिए नियम, गरीब के लिए सजा”
मेरे शहर के एक नामी मॉडर्न स्कूल का एनुअल डे इस बार इतना “शानदार” रहा कि देखने वालों की आंखों में कभी चमक आई… तो कभी हल्की सी चुभन भी।
मंच पर नन्हे-मुन्ने बच्चे तिरंगा लहराते हुए जब देशभक्ति गीतों पर थिरके, तो लगा-बस यही तो है असली भारत… यही है भविष्य। माता-पिता की आंखों में गर्व था… कुछ आंखें नम भी थीं…
लेकिन उसी गर्व के पीछे एक खामोश सी मजबूरी भी खड़ी थी-बिना ताली बजाए, बिना दिखे।
क्योंकि इस बार देशभक्ति “फ्री” नहीं थी… उसकी एंट्री फीस थी-500
रुपये।
अब 500 रुपये किसी के लिए एक छोटी सी रकम हो सकती है…
लेकिन कुछ घरों में यही 500 रुपये पूरे हफ्ते का चूल्हा जलाते हैं।
RTE के तहत पढ़ने वाले गरीब बच्चों के माता-पिता के लिए ये 500 रुपये सिर्फ नोट नहीं थे… ये उनके पसीने की कमाई थे… उनकी जरूरतों से काटा गया हिस्सा… उनके अधूरे सपनों का एक टुकड़ा।
“मम्मी, मैं भी स्टेज पर जाऊंगा…”
इस मासूम सी जिद के आगे हर हिसाब हार गया। किसी ने जेब टटोली, किसी ने उधार मांगा, किसी ने अपनी छोटी खुशी दबा दी… और आखिरकार गरीब बच्चा भी मंच पर पहुंच गया- देशभक्ति निभाने के लिए।
उधर स्कूल प्रशासन ने भी बड़ी “बराबरी” दिखाई ना अमीर, ना गरीब… सबके लिए एक ही नियम-500 रुपये!
(बस फर्क इतना था कि किसी ने मुस्कुराकर दिए… और किसी ने दिल पर पत्थर रखकर ।)
कार्यक्रम आगे बढ़ा… तालियां गूंजी… मोबाइल बाहर निकला… फ्लैश चमका… फोटो कैद हुई… देशभक्ति का रंग चढ़ा…
और तभी DJ अंकल ने सोचा- “अब थोडी मॉडर्न देशभक्ति हो जाए!”
गाना बजा-
“मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा रहता है…”
अब छोटे-छोटे बच्चे उस पर ऐसे थिरक रहे थे जैसे “चांद मामा” अभी स्टेज पर आने वाले हों!… उन्हें ना गाने का मतलब पता… ना भाव…
बस उन्हें इतना पता था-
“टीचर ने कहा है मुस्कुराना है… तो मुस्कुराना है।”
माता-पिता थोड़ा कन्फ्यूज… कुछ हंस रहे थे… कुछ सोच रहे थे-
“ये देशभक्ति का नया सिलेबस है क्या?”
और स्कूल प्रशासन पूरी तरह कंफर्टेबल- “भीड़ खुश है, वीडियो बन रहे हैं…
मिशन पूरा !”
अब जरा भारतीय संस्कृति की बात कर लें…
वो संस्कृति जो सिखाती है- “गुरु ज्ञान का मार्ग दिखाता है, और शिक्षा
जीवन का आधार बनाती है…”
लेकिन यहां नया अध्याय खुला –
“गुरु इवेंट मैनेज करता है, और शिक्षा स्टेज शो बन जाती है!”
और शायद उसी वक्त कहीं पीछे खड़ी भारतीय संस्कृति हल्की सी मुस्कुराकर बोली- “मुझे बुलाया तो था… पर मेरी बारी अभी भी नहीं आई।”
हमारी संस्कृति तो सिखाती है-
संस्कार, संवेदनशीलता और सही दिशा… लेकिन यहां तो नया फॉर्मूला चल रहा है-
“पहले इवेंट, फिर एंटरटेनमेंट… संस्कार अगर टाइम मिला तो!”
बच्चे आज भी मासूम हैं…
उनकी मुस्कान सच्ची है, उनका उत्साह असली है… लेकिन मंच की स्क्रिप्ट थोड़ी “रीमिक्स” हो गई है।
और अंत में वो सच्चाई, जो हंसी के बीच भी दिल को चुपचाप छू जाती है-
RTE बच्चों के माता-पिता दिनभर मजदूरी करने के बाद भी शायद ही 500 रुपये का नोट देखते हों…
500 रुपये की असली कीमत ना स्कूल समझता है, ना मंच… इसे तो सिर्फ
गरीबी और मजबूरी ही समझती है।
तो अगली बार जब एनुअल डे हो… तो DJ की आवाज थोड़ी कम कर दीजिए…और बच्चों की मासूमियत को थोड़ा सुन लीजिए…
क्योंकि देशभक्ति टिकट लेकर नहीं आती…
और संस्कार… वो DJ की बीट पर नहीं, दिल की समझ और समाज की जिम्मेदारी से पनपते हैं। (व्यंग्य लेख लेखक की कलम से…)
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