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मंदिर माफी से श्मशान भूमि तक भूमाफियाओं का कब्जा, मालपुरा में राजस्व तंत्र कटघरे में ?
मालपुरा (टोंक)। राजस्व विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों और भूमाफियाओं की कथित सांठ-गांठ का एक गंभीर और चौंकाने वाला मामला मालपुरा उपखंड में सामने आया है, जहां मंदिर माफी की सैकड़ों बीघा भूमि को खातेदारी में बदलकर न केवल नामान्तकरण किया गया, बल्कि खुलेआम विक्रय पत्रों का पंजीयन भी कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि जिस भूमि को राजस्व रिकॉर्ड स्वयं माफी घोषित कर रहा है, उसी भूमि को बेखौफ तरीके से खरीद-फरोख्त का माध्यम बना दिया गया।

मामला उपखंड के ग्राम चांदसेन का है, जहां आराजी खसरा नम्बर 466 से 486 तक कुल 104.06 बीघा भूमि संवत 2010 से 2029 तक राजस्व रिकॉर्ड में माफी मंदिर कल्याण, चांदसेन के नाम दर्ज थी। इसके बावजूद तहसील स्तर पर हुई कथित लापरवाही और मिलीभगत के चलते इस भूमि को खातेदारों के नाम दर्ज कर विक्रय पत्र पंजीबद्ध कर दिए गए। बताया जा रहा है कि यह पूरा खेल 04 जून 1976 को पारित एक डिक्री से जुड़ा है, जिसमें लगभग 600 बीघा भूमि के तकासमे का आदेश दिया गया था। नियमानुसार तहसील कार्यालय को केवल तकासमा करना था, लेकिन अधिकारियों ने तकासमे के स्थान पर पुजारी के नाम खातेदारी दर्ज कर दी। बाद में वर्ष 1992 में एडीएम और जिला कलेक्टर टोंक द्वारा खातेदारी अधिकार भी दे दिए गए।
वर्ष 2006 में तत्कालीन तहसीलदार मालपुरा ने भूमि को पुनः माफी मंदिर घोषित कराने के लिए रेफरेंस बनाकर प्रस्तुत किया था। इस पर 12 अगस्त 2012 को राजस्व मंडल अजमेर ने आदेश दिया कि 1976 की डिक्री के खिलाफ सक्षम न्यायालय में अपील करते हुए विस्तृत जांच के साथ पुनः रेफरेंस प्रस्तुत किया जाए। आरोप है कि आज तक न तो इस आदेश की पालना की गई और न ही राजस्व रिकॉर्ड में इसका अंकन किया गया। इसके उलट वर्तमान में विक्रय पत्रों का पंजीयन कर भूमि को भूमाफियाओं के हवाले कर दिया गया, जिससे पूरे प्रकरण में साजिश और आपसी मिलीभगत की आशंका और गहरा गई है।
मालपुरा में दूसरा मामला और भी गंभीर बताया जा रहा है, जहां बृजलाल नगर के खसरा नम्बर 1337/1807 की भूमि, जिस पर मौके पर श्मशान स्थित है, उसे भी कागजों में बेच दिया गया। इस भूमि के आवंटन के समय सुपुर्दगीनामे पर स्पष्ट रूप से अंकित था कि मौके पर कब्जा नहीं दिया जा सकता, इसके बावजूद पहले संस्था और बाद में अन्य व्यक्तियों के नाम विक्रय पत्र पंजीबद्ध कर नामान्तकरण खोल दिया गया। उल्लेखनीय है कि यह भूमि अनुसूचित जाति की महिला कमला बेवा एवं उनके पुत्रों के नाम आवंटित थी, जबकि नियमों के अनुसार अनुसूचित जाति की भूमि किसी संस्था या कंपनी के नाम पंजीकृत नहीं की जा सकती।
बताया गया है कि उक्त भूमि को लेकर अतिरिक्त जिला कलेक्टर टोंक और रेवेन्यू बोर्ड को रेफरेंस भेजा जा चुका है। वहीं अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश तथा अतिरिक्त जिला कलेक्टर टोंक के यहां मामला विचाराधीन है और स्थगन आदेश भी जारी हैं। इसके बावजूद 29 मई 2024 को विक्रय पत्र पंजीयन किया जाना प्रशासनिक कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
पूरे प्रकरण को लेकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने उपखंड अधिकारी मालपुरा और जिला कलेक्टर टोंक को ज्ञापन सौंपते हुए धारा 175 के तहत कार्रवाई कर भूमि को सरकारी घोषित कर कब्जा लेने की मांग की है। मामले के सामने आने के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि मंदिर माफी और श्मशान भूमि का पंजीयन आखिर किसके संरक्षण में हुआ, न्यायालय और रेवेन्यू बोर्ड के आदेशों की अनदेखी क्यों की गई और जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों पर कब कार्रवाई होगी। मालपुरा में उजागर हुआ यह मामला केवल जमीन के फर्जीवाड़े तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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