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“नगरी में बाबूजी का मोहजाल, फाइलों पर अदृश्य राज!”

“नगरी में बाबूजी का मोहजाल, फाइलों पर अदृश्य राज!”

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हमारी नगरी भी निराली है और उसकी पालिका तो उससे भी दो कदम आगे… लेकिन असली कमाल तो पालिका के बाबुओं का है- खासतौर पर वो एक बाबूजी, जिनकी कला देखते ही बनती है।

न ज्यादा बोलते हैं, न ज्यादा दिखते हैं… लेकिन हर फाइल में ऐसे फिट हैं जैसे स्टेपल पिन-निकालो तो पूरी व्यवस्था बिखर जाए !

बाबूजी की सूरत इतनी भोली कि पहली नजर में कोई भी उन्हें संत समझ बैठे… और काम इतने गहरे कि बड़े-बड़े खिलाड़ी भी इनके सामने इंटर्नशिप करते नजर आएं। कहते हैं-जहां नियमों की किताब खत्म होती है, वहीं से बाबूजी का “प्रैक्टिकल ज्ञान” शुरू होता है।

और सबसे बड़ी बात बाबूजी में एक अद्भुत कला है… हर किसी को मोहित कर देने की।

कॉलोनाइजर हों या भूमाफिया, सब इनके इस मोहजाल में ऐसे फंसे हैं जैसे बरसों पुरानी रेल की पटरी-एकदम सेट! इस पटरी पर बाबूजी की रेल ऐसी दौड़ती है कि इंजन भी पूछे-

“भाई, मेरी जरूरत ही क्या है?” न टिकट, न प्लेटफॉर्म… सीधा “काम-पूर्ण” स्टेशन !

बाबूजी का दिल भी बहुत विशाल है- खासतौर पर उन फाइलों के लिए जिनमें “वजन” का आध्यात्मिक महत्व होता है। ऐसी फाइलें इनके पास आते ही धन्य हो जाती हैं… और उनके मालिक इतने प्रसन्न होकर निकलते हैं कि मुंह से अपने आप निकल पड़ता है “आज तो बाबूजी ने पूरी तरह निहाल कर दिया!”

लेकिन अगर आप आमजन हैं या गरीब तबके से आते हैं… तो आपके लिए बाबूजी की खास “हेल्थ पॉलिसी” लागू होती है-

एक फाइल, दस चक्कर!

ताकि जनता फिट रहे और दफ्तर की रौनक भी बनी रहे। सरकारी योग का ऐसा लाइव प्रोग्राम शायद ही कहीं और देखने को मिले।

अब बात करें आस्था की- तो बाबूजी साक्षात भक्त हैं। लक्ष्मी मैया के प्रति इनकी श्रद्धा देखते ही बनती है। जैसे ही दर्शन होते हैं, तुरंत सिर से लगाकर जेब में ऐसे सहेज लेते हैं जैसे कोई दुर्लभ प्रसाद मिला हो।

अब ये लक्ष्मी मैया आगे किन-किन “धार्मिक स्थलों” (जेबों) की यात्रा करती हैं, यह बाबूजी की गोपनीय फाइलों का विषय है… और आम जनता के लिए यह ज्ञान फिलहाल “RTI से बाहर” रखा गया है।

कुल मिलाकर हमारी नगरी में अगर कोई असली “बुलेट ट्रेन” दौड़ रही है, तो वो बाबूजी की अदृश्य रेल ही है…

जहां मंजिल भी तय, रास्ता भी तय और रफ्तार भी तय – बस टिकट का तरीका थोड़ा अलग है!

पालिका, नगरी और बाबूजी- तीनों मिलकर ऐसा सिस्टम चला रहे हैं कि सिस्टम खुद सोच में पड़ जाए-

“मैं असली हूं… या ये?” (व्यंग्य लेख : लेखक की कलम से)

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