Chief Editor
नेताजी ! यह पब्लिक है पब्लिक… सब जानती है… चुनावी स्टंट को पहचानती है…
शहर में चुनावी मौसम के रंग चारों तरफ बिखर चुके हैं। नेताजी भी दौरे पर निकल पड़े हैं। जैसे ही नेताजी अपने गांव में पहुंचे तो लोग हैरत भरी आँखों से नेताजी की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे। शायद पहचानने की कोशिश कर रहे थे। नेताजी गांव वालों की आँखों को अपने ऊपर गड़ी देखकर समझ गए। नेताजी झट से बोल पड़े मैं.. हूँ… मैं.. घसीटा राम … आपका अपना, स्थानीय नेता। बेचारे देहाती लोग नेताजी को कैसे पहचानते .. नेताजी को कई सालों बाद जो देखा। गांव का प्रवासी नेता जो कभी सरपंच तो नहीं बन सका अब विधानसभा देखने का ख्वाब देख रहा है। यह तो मुंगेरीलाल से भी आगे निकल आया (गांव वाले आपस में खुसर मुसर करने लगे)… नेताजी गांव वालों को खुसर मुसर करते देख बोले…. हमारे गांव में बहुत से बच्चे पढ़ने में होशियार है…. इनको मैं इनाम देने आया हूँ… गांव की छठी कक्षा में पढ़ने वाला छोटू नेताजी की बाते सुनकर बीच मे ही बोल पड़ा। क्या आप भी चुनाव लड़ोगे। पहले भी तो बच्चे पढ़ते थे…चुनावी साल में ही हमारी याद आई क्या… नेताजी यह पब्लिक है…. पब्लिक .. सब जानती है और आपके चुनावी स्टंट को भी पहचानती है…. नेताजी बेचारे इनाम के साथ खाने के पैकिट भी लाए थे… सब धरे के धरे रह गए। छोटू की बातें सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुरा रहा था… मुझे लगा कि अब मेरा गांव भी धीरे धीरे कुंभकर्णी नींद से जाग रहा है…. खाने खिलाने के जमाने गए.. अब नेताजी पब्लिक हिसाब मांगती है … हिसाब… (सम्पादकीय लेख)
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