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स्पीड पोस्ट से आया आरोपपत्रः सच्चाई की दस्तक या बदनाम करने की साजिश ?
मालपुरा (टोंक)। पालिका प्रशासन को कटघरे में खड़ा करने वाला स्पीड पोस्ट से आया आरोपपत्र अब शहर में चर्चा, संशय और सवालों का बड़ा कारण बन गया है। लिफाफे के भीतर लिखे गए गंभीर आरोपों ने जहां नगर पालिका में हड़कंप मचा दिया है, वहीं अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस रहस्यमयी आरोपपत्र के पीछे आखिर कौन है और उसकी मंशा क्या है?
सबसे पहला और अहम सवाल यह उठता है कि आरोप लगाने वाले शख्स ने अपनी असली पहचान क्यों छुपाई? अगर आरोप सही हैं तो सामने आकर बात रखने में संकोच क्यों ? और अगर आरोप बेबुनियाद हैं, तो क्या यह किसी को बदनाम करने की सुनियोजित साजिश है ? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि कॉलोनी नियमन से जुड़ी इतनी बारीक और तकनीकी जानकारी उस व्यक्ति को कहां से मिली? क्या वह कोई अंदरूनी व्यक्ति है? क्या किसी पूर्व या वर्तमान कर्मचारी की भूमिका से इनकार किया जा सकता है या फिर यह जानकारी किसी व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा है? आरोपपत्र में पालिकाध्यक्ष, अधिशासी अधिकारी (ईओ) और पालिका बाबू निहालचंद जैन पर मिलकर लगभग 65 लाख रुपये के राजकोषीय नुकसान का आरोप लगाया गया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ये आरोप दस्तावेज़ी साक्ष्यों पर आधारित हैं या सिर्फ आरोपों का पुलिंदा ? पूर्व पालिकाध्यक्ष आशा नामा और वर्तमान पालिका उपाध्यक्ष पवन मेंदवास्या द्वारा स्पीड पोस्ट आरोपपत्र मिलने की पुष्टि ने मामले को और गंभीर बना दिया है। अब सवाल यह भी है कि क्या यह मामला राजनीतिक खींचतान से जुड़ा है? या फिर किसी बड़े घोटाले की परतें खुलने वाली हैं? शहरवासियों के मन में भी कई सवाल कुलबुला रहे हैं-क्या पालिका प्रशासन खुद इस मामले की निष्पक्ष जांच करवाएगा ? या फिर उच्च स्तर से जांच बैठाई जाएगी? और सबसे अहम सच सामने आएगा या मामला फाइलों में ही दब जाएगा? फिलहाल इतना तय है कि स्पीड पोस्ट से आया यह आरोपपत्र सिर्फ एक पत्र नहीं, बल्कि कई अनसुलझे सवाल छोड़ गया है। अब निगाहें प्रशासन, जांच एजेंसियों और उन लोगों पर टिकी हैं जो सच को सामने लाने का दावा करते हैं। स्पीड पोस्ट आरोपपत्र का सच क्या है-यह जांच के बाद ही साफ हो पाएगा।
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